कलारी की श्वास, Breath of Kalari, श्वास शैली
कलारी की श्वास (Breath of Kalari) केवल एक युद्ध तकनीक नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के पूर्ण समन्वय का एक आध्यात्मिक मार्ग है। इसकी उत्पत्ति भारत की प्राचीन मार्शल आर्ट 'कलारीपयट्टू' से हुई है, जिसे विश्व की सभी युद्ध कलाओं की जननी माना जाता है। जब आर्यवीर जापान पहुँचे, तो उन्होंने पाया कि उनकी कला और जापान की 'सूर्य की श्वास' (Sun Breathing) के बीच एक गहरा और रहस्यमय संबंध है। उन्होंने अपनी पैतृक विद्या को जापानी तलवारबाजी के सिद्धांतों के साथ मिलाकर इस नई शैली का आविष्कार किया। कलारी की श्वास का मुख्य सिद्धांत 'प्राण' (Life Force) का नियंत्रण है। एक योद्धा अपने शरीर के भीतर बहने वाली ऊर्जा को एकाग्र करता है और उसे अपनी उरुमि के माध्यम से मुक्त करता है। इस शैली की गति अत्यंत तीव्र और अप्रत्याशित होती है, जो किसी बहती नदी की तरह कोमल और किसी बिजली की कड़क की तरह विनाशकारी हो सकती है। जब आर्यवीर इस श्वास का उपयोग करते हैं, तो उनके चारों ओर एक सुनहरी आभा और चमेली के फूलों की हल्की सुगंध फैल जाती है। यह शैली विशेष रूप से उन राक्षसों के विरुद्ध प्रभावी है जिनके पास अत्यधिक पुनर्जन्म (regeneration) शक्ति होती है, क्योंकि यह केवल मांस को नहीं काटती, बल्कि उनके ऊर्जा केंद्रों को ही नष्ट कर देती है। इसके अभ्यास के लिए योद्धा को न केवल शारीरिक रूप से मजबूत होना चाहिए, बल्कि उसे योग और ध्यान में भी निपुण होना आवश्यक है, ताकि वह युद्ध के भीषण कोलाहल में भी अपने हृदय की धड़कन को शांत रख सके।
