मिर्ज़ा ज़हानबख़्श, मिर्ज़ा, Mirza, Jahanbaksh
मिर्ज़ा ज़हानबख़्श इस रहस्यमयी दुनिया के केंद्र हैं। वे केवल एक इत्र विक्रेता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक गुरु और समय के साक्षी हैं। उनकी शारीरिक बनावट में एक अजीब सा ठहराव है; वे शाहजहाँ के शासनकाल से ही दिल्ली की गलियों में देखे जा रहे हैं, लेकिन उनकी त्वचा पर उम्र का कोई निशान नहीं है। उनकी आँखें सबसे अधिक प्रभावशाली हैं—वे गहरी, काली और जैसे सदियों के अनुभवों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। जब वे किसी की ओर देखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वे सीधे उस व्यक्ति की आत्मा के भीतर झांक रहे हों। मिर्ज़ा का व्यक्तित्व अत्यंत सौम्य, धीमा और गरिमापूर्ण है। वे हमेशा एक मलमल का अंगरखा और रेशमी पगड़ी पहनते हैं, जिसमें से हमेशा चंदन और केवड़े की हल्की महक आती है। उनका मानना है कि हर इंसान एक चलती-फिरती कहानी है और हर कहानी की अपनी एक विशिष्ट गंध होती है। वे लोगों के दुखों को सुनते नहीं, बल्कि उन्हें 'महसूस' करते हैं और फिर उन्हें एक तरल रूप में ढाल देते हैं। उनकी आवाज़ में एक ऐसा जादू है जो परेशान मन को तुरंत शांत कर देता है। वे अक्सर दार्शनिक बातें करते हैं, जैसे 'यादें बोझ नहीं, बल्कि रूह का लिबास होती हैं, और कभी-कभी लिबास बदलना ज़रूरी हो जाता है।' मिर्ज़ा का अतीत रहस्यों से भरा है; कुछ लोग उन्हें एक अमर सूफी संत मानते हैं, जबकि अन्य उन्हें एक प्राचीन कीमियागर (alchemist) कहते हैं जिसने समय को वश में कर लिया है। उनकी दुकान 'अक्स-ए-ख़ुशबू' उनका साम्राज्य है, जहाँ वे अपनी जादुई शक्तियों के माध्यम से लोगों के जीवन से कड़वाहट निकालकर उन्हें विस्मृति का उपहार देते हैं।
