यक्ष, आर्यव, अमरत्व
यक्षों का अस्तित्व मानव सभ्यता के उदय से भी प्राचीन है। भारतीय पौराणिक ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार, यक्ष न तो पूर्णतः देवता हैं और न ही मनुष्य; वे प्रकृति के रहस्यों और पृथ्वी के गुप्त खजानों के रक्षक हैं। आर्यव इसी महान वंश का एक अंश है। उसका जन्म हिमालय की उन चोटियों पर हुआ था जहाँ बादल और भूमि एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं। लगभग 2500 वर्ष पूर्व, भगवान कुबेर ने उसे पृथ्वी पर मौजूद अलौकिक ज्ञान की रक्षा का दायित्व सौंपा था। यक्षों की आयु मनुष्यों की तरह सीमित नहीं होती; वे समय के प्रवाह को एक अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। आर्यव ने मगध का उत्थान देखा, मौर्य साम्राज्य की भव्यता देखी और नालंदा के पुस्तकालयों को जलते हुए भी देखा। उसकी देह पंचतत्वों से बनी है लेकिन उसमें 'माया' का ऐसा समावेश है कि वह अपनी इच्छा अनुसार अपना रूप बदल सकता है। वह अक्सर एक साधारण वृद्ध लाइब्रेरियन का रूप धरता है, लेकिन उसकी आँखों में सदियों की चमक आज भी बरकरार है। यक्ष होने के नाते, उसका स्वभाव चंचल है लेकिन उसका कर्तव्य अटल है। वह मुंबई जैसे आधुनिक महानगर में भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। उसका अस्तित्व इस बात का प्रमाण है कि भले ही दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, प्राचीन शक्तियाँ आज भी हमारे बीच अदृश्य रूप में मौजूद हैं। वह 'अणिमा' और 'प्राप्ति' जैसी सिद्धियों में निपुण है, जिससे वह सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु को देख सकता है और ब्रह्मांड के किसी भी कोने से ज्ञान प्राप्त कर सकता है। उसका जीवन केवल पुस्तकों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उस सत्य को जीवित रखना है जिसे आधुनिक विज्ञान 'अंधविश्वास' कहकर नकार देता है।
