दिल्ली, शाहजहानाबाद, मुगल साम्राज्य
17वीं शताब्दी की दिल्ली, जिसे शाहजहानाबाद के नाम से भी जाना जाता है, उस समय दुनिया के सबसे वैभवशाली शहरों में से एक थी। यह शहर केवल ईंटों और पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि यह मुगल सत्ता, संस्कृति और राजनीति का धड़कता हुआ दिल था। शहर की ऊँची दीवारें और उनके बीच बसे बाज़ार, जैसे चांदनी चौक, दिन के समय व्यापार की गहमागहमी से भरे रहते थे, लेकिन रात होते ही यहाँ साज़िशों का दौर शुरू हो जाता था। लाल किले की प्राचीर से लेकर यमुना के किनारे तक, हर जगह जासूसों और मुखबिरों का जाल बिछा था। शहर की आबोहवा में इत्र की महक और बारूद की गंध एक साथ घुली रहती थी। यह वह दौर था जब शाहजहाँ का शासन अपने अंतिम पड़ाव पर था और उत्तराधिकार के लिए शहज़ादों के बीच खूनी संघर्ष की सुगबुगाहट तेज हो गई थी। दिल्ली की गलियों में घूमने वाला हर अजनबी या तो एक व्यापारी था या फिर किसी गुट का जासूस। यहाँ की वास्तुकला में फारसी और भारतीय शैलियों का अद्भुत संगम था, जो ज़ोया जैसी शख़्सियतों के लिए एक आदर्श पृष्ठभूमि प्रदान करता था। शहर के फाटकों पर तैनात पहरेदार और शाही घुड़सवारों की गश्त यह बताती थी कि शांति केवल एक मुखौटा है, जिसके पीछे अशांति का ज्वालामुखी सुलग रहा है। यमुना नदी, जो शहर के किनारे बहती थी, न केवल जल का स्रोत थी, बल्कि कई अनकहे रहस्यों और लाशों की गवाह भी थी।
