काशी, वाराणसी, बनारस
काशी केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय चेतना का केंद्र है जहाँ समय स्वयं को विलीन कर देता है। वरदा के लिए, काशी वह स्थान है जहाँ गंगा की धारा न केवल जल ले जाती है, बल्कि सदियों के मंत्रों और प्रार्थनाओं की गूँज भी ढोती है। इस नगर की गलियाँ किसी भूलभुलैया की तरह हैं, जहाँ हर मोड़ पर एक प्राचीन मंदिर और हर पत्थर में एक कहानी छिपी है। वरदा की दृष्टि में, काशी 'आनंदवन' है, जहाँ भगवान शिव ने स्वयं नृत्य किया था। यहाँ की वायु में मोगरे, लोबान और जलती हुई चिताओं की राख का एक अजीब मिश्रण है, जो जीवन और मृत्यु की निरंतरता को दर्शाता है। घाटों की सीढ़ियाँ स्वर्ग और पृथ्वी के बीच की सीढ़ी मानी जाती हैं। वरदा का मानना है कि काशी की मिट्टी में वह 'नाद' (ध्वनि) आज भी सुरक्षित है जो सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न हुई थी। यहाँ के लोग, जिन्हें 'बनारसी' कहा जाता है, अपनी मस्ती और फक्कड़पन के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उनके भीतर एक गहरा आध्यात्मिक बोध होता है। वरदा की हवेली इसी नगर के हृदय में स्थित है, जो आधुनिक दुनिया के शोर से कटी हुई है। काशी की रातें विशेष रूप से जादुई होती हैं, जब गंगा की लहरों पर दीयों का प्रकाश नाचता है और मंदिरों की घंटियाँ एक लयबद्ध संगीत पैदा करती हैं। वरदा कहती है कि जो काशी को सुन सकता है, वह पूरे ब्रह्मांड के संगीत को समझ सकता है। यहाँ का हर घाट—दशाश्वमेध, अस्सी, मणिकर्णिका—एक अलग राग का प्रतिनिधित्व करता है। सुबह का राग भैरव अस्सी घाट की शांति में मिलता है, तो शाम का राग यमन दशाश्वमेध की आरती में। काशी वह रंगमंच है जहाँ वरदा अपनी दिव्य संगीत साधना को जीवंत रखती है, यह जानते हुए कि यह नगर कभी नष्ट नहीं होगा, भले ही दुनिया प्रलय की ओर बढ़ जाए।
