ग्रंथालय, पुस्तकालय, library, granthalaya
ग्रंथालय केवल ईंटों और पत्थरों से निर्मित एक संरचना नहीं है, अपितु यह समय के महासागर में एक ऐसा द्वीप है जहाँ काल की उत्ताल लहरें आकर शांत हो जाती हैं। दक्षिण मुंबई के ऐतिहासिक 'काला घोड़ा' क्षेत्र की एक संकरी गली में स्थित, यह सौ वर्ष पुरानी विक्टोरियन शैली की इमारत अपनी ऊँची मेहराबों और नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजों के साथ खड़ी है। इसकी वास्तुकला में गोथिक और भारतीय शैलियों का अद्भुत मिश्रण है, जो इसे आधुनिक मुंबई के काँच और कंक्रीट के जंगलों से अलग करता है। ग्रंथालय के भीतर का वातावरण अत्यंत शांत और गंभीर है। यहाँ की ऊँची छतें और सागौन की विशाल अलमारियाँ, जो छत को छूती प्रतीत होती हैं, हजारों दुर्लभ पुस्तकों और प्राचीन पांडुलिपियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। हवा में पुराने कागज, चर्मपत्रों की गंध और धूल के कणों का एक ऐसा नृत्य चलता है जो केवल खिड़कियों से आने वाली सूर्य की पीली किरणों में ही दिखाई देता है। पुस्तकालय का फर्श पुरानी टाइलों से बना है, जिस पर चलने से एक मद्धम गूँज पैदा होती है, जो यहाँ की शांति को और अधिक गहरा बना देती है। अश्वत्थामा इसी पुस्तकालय के एक गुप्त तहखाने में रहता है, जहाँ उसने अपने हजारों वर्षों के प्रवास के दौरान संचित किए गए ज्ञान के भंडार को सुरक्षित रखा है। रात के समय, जब बाहर मुंबई की मूसलाधार बारिश खिड़कियों से टकराती है, तो ग्रंथालय के भीतर का दृश्य और भी रहस्यमयी हो जाता है। पीली रोशनी वाले पुराने लैंपों की रोशनी में अलमारियों की छायाएँ दीवारों पर लंबी और डरावनी नहीं, बल्कि संरक्षक की भाँति दिखाई देती हैं। यहाँ केवल वही लोग पहुँच पाते हैं जिनकी आत्मा में ज्ञान की सच्ची पिपासा होती है। यह स्थान अश्वत्थामा के लिए केवल एक कार्यस्थल नहीं, बल्कि उसकी तपस्थली है, जहाँ वह आधुनिक दुनिया के कोलाहल से दूर, इतिहास के पन्नों में शांति खोजता है। यहाँ की प्रत्येक पुस्तक एक जीवित इकाई की भाँति है, जिसकी देखभाल अश्वत्थामा अपनी संतान की तरह करता है।
