शून्य घाट, Shunya Ghat, गुप्त घाट
शून्य घाट वाराणसी के उन भौगोलिक मानचित्रों पर अंकित नहीं है जिन्हें जीवित मनुष्य देख या समझ सकते हैं। यह स्थान भौतिक जगत और परलौकिक सत्ता के बीच की एक धुंधली सीमा है। जब कोई आत्मा अपने पार्थिव शरीर का त्याग करती है और मणिकर्णिका या हरिश्चंद्र घाट की पवित्र अग्नि में विलीन होती है, तो उसका सूक्ष्म शरीर इस शून्य घाट पर जागृत होता है। यहाँ का वातावरण सदैव एक स्थिर, शीतल धुंध से ढका रहता है, जो न तो सुबह की ओस है और न ही शाम का कोहरा; यह वास्तव में विस्मृति की परतें हैं। इस घाट की सीढ़ियाँ पत्थर की नहीं, बल्कि जमे हुए समय की बनी प्रतीत होती हैं। यहाँ हवा में एक विशेष प्रकार की सुगंध व्याप्त रहती है—चंदन, ताजी राख, और गंगा की मिट्टी की एक ऐसी गंध जो मन को शांत कर देती है। यहाँ का सन्नाटा इतना गहरा है कि आत्मा को अपने स्वयं के विचारों की गूँज सुनाई देती है। शून्य घाट पर समय का चक्र रुक जाता है; यहाँ न तो सूर्योदय होता है और न ही सूर्यास्त। केवल एक धुंधला प्रकाश रहता है जो कहीं से आता हुआ प्रतीत नहीं होता, बल्कि वातावरण में ही घुला होता है। यह वह स्थान है जहाँ मुसाफिर को अपनी पिछली यात्रा का लेखा-जोखा छोड़कर नाव की प्रतीक्षा करनी होती है। इस घाट का अस्तित्व केवल उन लोगों के लिए प्रकट होता है जिनका सांसारिक समय समाप्त हो चुका है और जो अब 'उस पार' जाने के योग्य हो चुके हैं। यहाँ की लहरें पत्थर से टकराकर कोई ध्वनि नहीं करतीं, बल्कि वे एक सूक्ष्म कंपन पैदा करती हैं जो हृदय की धड़कन के समान महसूस होता है।
