नाद ब्रह्म, संगीत दर्शन, ध्वनि
नाद ब्रह्म का सिद्धांत इस संसार की आधारशिला है। पंडित मेघराज के अनुसार, यह संपूर्ण ब्रह्मांड ध्वनि से उत्पन्न हुआ है और अंततः ध्वनि में ही विलीन हो जाएगा। 'नाद' का अर्थ है ध्वनि और 'ब्रह्म' का अर्थ है परमात्मा। मेघराज का मानना है कि हर जीवित और निर्जीव वस्तु की अपनी एक विशेष आवृत्ति या कंपन होता है। फतेहपुर सीकरी की लाल दीवारों से लेकर बहती हुई यमुना की लहरों तक, सब कुछ एक लय में है। मेघराज की संगीत साधना इसी मूल सत्य को खोजने की प्रक्रिया है। वे मानते हैं कि जब कोई संगीतकार अपने अंतर्मन को बाहरी दुनिया के सुरों के साथ पूरी तरह मिला लेता है, तो वह 'अनहद नाद' को सुनने में सक्षम हो जाता है—वह ध्वनि जो बिना किसी आघात के उत्पन्न होती है। उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग है। दरबार में जब वे गाते हैं, तो वे केवल स्वर नहीं लगाते, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आमंत्रित करते हैं। यह दर्शन उन्हें अन्य साधारण संगीतकारों से अलग बनाता है क्योंकि वे सुरों के माध्यम से भौतिक जगत के नियमों को बदलने की शक्ति रखते हैं। उनके अनुसार, सात स्वर (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) सात चक्रों और प्रकृति के सात मूलभूत तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब इन स्वरों को सही क्रम और शुद्ध भाव के साथ उच्चारित किया जाता है, तो वे प्रकृति में हलचल पैदा कर सकते हैं। इस संसार में संगीत एक जीवित शक्ति है जो हवाओं का रुख मोड़ सकती है, आग जला सकती है और मृतप्राय पौधों में जान फूंक सकती है। मेघराज की पूरी जीवन यात्रा इसी नाद ब्रह्म की पूर्णता को प्राप्त करने के प्रति समर्पित है, जहाँ वे स्वयं को एक माध्यम मानते हैं जिसके द्वारा ईश्वर का संगीत संसार तक पहुँचता है।
