मौन-शिखर, Moun-Shikhar, गुप्त घाटी, हिमालय
मौन-शिखर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, अपितु यह अनंत शांति की एक ऐसी पराकाष्ठा है जहाँ समय की लहरें भी किनारे पर आकर ठहर जाती हैं। हिमालय की अत्यंत दुर्गम और पवित्र चोटियों के बीच छिपी यह गुप्त घाटी एक ऐसे आयाम में स्थित प्रतीत होती है जहाँ भौतिक जगत के नियम शिथिल हो जाते हैं। यहाँ चारों ओर श्वेत बर्फ की ऐसी चादर बिछी है जो सूर्य की किरणों के स्पर्श से नहीं, बल्कि स्वरसेन की दिव्य वीणा की आभा से चमकती है। इस घाटी की सबसे बड़ी विशेषता इसका वातावरण है; यहाँ की वायु में एक प्रकार की अलौकिक तरलता है जो फेफड़ों में भरते ही आत्मा को शुद्ध कर देती है। यहाँ का आकाश सदैव गहरे नीले रंग का बना रहता है, और रात्रि के समय सप्तऋषि नक्षत्र इतने निकट प्रतीत होते हैं मानो उन्हें हाथ बढ़ाकर छुआ जा सके। मौन-शिखर में पहुँचने वाला कोई भी जीव, चाहे वह मनुष्य हो या पशु, अपनी हिंसक प्रवृत्तियों को त्याग देता है। यहाँ के झरने गिरने पर शोर नहीं करते, बल्कि स्वरसेन के संगीत के साथ सुर मिलाकर एक मंद लय उत्पन्न करते हैं। इस घाटी के चारों ओर बर्फीले तूफानों का एक सुरक्षा घेरा है, जो केवल उन्हीं को प्रवेश की अनुमति देता है जिनका हृदय छल-कपट से रहित हो। यहाँ की शिलाएं पारदर्शी स्फटिक की तरह हैं, जो संगीत की ध्वनियों को अवशोषित करती हैं और रात में मंद प्रकाश उत्सर्जित करती हैं। यह स्थान स्वरसेन की तपस्या का केंद्र है, जहाँ वह कुरुक्षेत्र के घावों को भरने के लिए ब्रह्मांडीय संगीत का सृजन करता है। यहाँ की मिट्टी में भी चंदन की सुगंध रची-बसी है, जो भक्तों और साधकों को मानसिक शांति प्रदान करती है। मौन-शिखर में समय का अनुभव भिन्न है; यहाँ व्यतीत किया गया एक क्षण संसार के कई वर्षों के ध्यान के समान फलदायी होता है। यह घाटी स्वरसेन की चेतना का विस्तार है, जहाँ प्रकृति और संगीत एक दूसरे में विलीन हो चुके हैं। यहाँ की हर बर्फ की बूंद एक मंत्र की तरह पवित्र है और हर हवा का झोंका एक आशीर्वाद की तरह कोमल है।
