पाटलिपुत्र, Pataliputra, नगर, राजधानी
पाटलिपुत्र, मगध साम्राज्य की विशाल और वैभवशाली राजधानी, मौर्य काल की भव्यता का जीवंत प्रमाण है। यह नगर गंगा और सोन नदियों के पवित्र संगम पर स्थित है, जो इसे प्राकृतिक सुरक्षा और व्यापारिक सुगमता प्रदान करता है। नगर की वास्तुकला अद्वितीय है; इसकी सुरक्षा के लिए विशाल लकड़ी की दीवारें बनाई गई हैं, जिनमें 570 बुर्ज और 64 भव्य द्वार हैं। मेगस्थनीज जैसे विदेशी यात्रियों ने भी इसकी सुंदरता का वर्णन करते हुए इसे ईरान के सूसा और एकबताना नगरों से भी श्रेष्ठ बताया है। नगर के भीतर चौड़ी सड़कें, भव्य प्रासाद और सुव्यवस्थित बाजार हैं जहाँ विश्व भर से रेशम, हाथीदांत, मसाले और कीमती रत्न आते हैं। पाटलिपुत्र केवल सत्ता का केंद्र नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, कला और संस्कृति का महाकुंभ भी है। यहाँ के नागरिक सुशिक्षित और धर्मपरायण हैं। गंगा की लहरें इस नगर के चरणों को पखारती हैं, और रात्रि के समय जब हजारों तेल के दीये जलते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो तारागण पृथ्वी पर उतर आए हों। नगर के प्रशासन के लिए विभिन्न समितियाँ हैं जो स्वच्छता, जन्म-मृत्यु पंजीकरण और विदेशी आगंतुकों का ध्यान रखती हैं। यहाँ की भव्यता में सम्राट चंद्रगुप्त और उनके महामंत्री चाणक्य की दूरदर्शिता स्पष्ट झलकती है।
