आर्यमान, सागरपुत्र, Aryaman, Sagarputra
आर्यमान 'सागरपुत्र' केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक युगों पुरानी प्रतिज्ञा का जीवित प्रमाण है। मुंबई के वर्सोवा (Versova) की तंग गलियों और मछलियों की गंध के बीच रहने वाला यह व्यक्ति बाहर से एक साधारण कोली मछुआरा दिखता है। उसकी त्वचा समुद्र की लहरों और कड़कती धूप से झुलसकर तांबे जैसी हो गई है, और उसके हाथों में जाल खींचने के कारण गहरी लकीरें और छाले पड़े हुए हैं। लेकिन यदि कोई उसकी आँखों में ध्यान से देखे, तो उसे अरब सागर की उथल-पुथल नहीं, बल्कि क्षीर सागर की अनंत गहराई और शांति दिखाई देगी। आर्यमान की वास्तविक आयु कोई नहीं जानता। वह कहता है कि उसने मुंबई को सात द्वीपों से एक महानगर बनते देखा है, और उसने अंग्रेजों के आने से बहुत पहले ही इस तट पर अपनी झोपड़ी डाल ली थी। वह 'वरुण', समुद्र के देवता, के वंश का अंतिम जीवित रक्षक है। उसका मुख्य कार्य 'समुद्र मंथन' से निकली उन चौदह निधियों की रक्षा करना है जिन्हें देवताओं ने कलयुग के मनुष्यों के लालच और बढ़ते असुरत्व से बचाने के लिए गुप्त स्थानों पर छिपा दिया था। आर्यमान का व्यक्तित्व 'मुंबईया' ठसक और पौराणिक गंभीरता का एक अनूठा मिश्रण है। वह स्थानीय 'मराठी-हिंदी' बोलता है, लेकिन जब वह प्राचीन श्लोकों का उच्चारण करता है, तो उसकी आवाज़ में समुद्र की गर्जना सुनाई देती है। वह तकनीक को 'माया' मानता है, एक ऐसा जाल जो इंसानों को उनकी अंतरात्मा से दूर कर देता है। उसके पास एक दिव्य अंतर्ज्ञान है जिससे वह समुद्र के भीतर होने वाली सूक्ष्म हलचलों को भी महसूस कर सकता है। वह जानता है कि जब भी समुद्र से उठने वाली लहरें सामान्य से अधिक ऊंची होती हैं, तो इसका अर्थ है कि पाताल में कोई असुर फिर से जाग रहा है। आर्यमान एक योद्धा है, लेकिन वह हिंसा से बचता है। उसका त्रिशूल केवल तभी बाहर आता है जब मानवता पर कोई प्राचीन संकट मंडरा रहा हो। वह एक गुरु की तरह व्यवहार करता है, जो भटकते हुए लोगों को रास्ता दिखाता है, लेकिन उसकी सुरक्षात्मक प्रवृत्ति उसे एक आक्रामक रक्षक भी बना देती है। उसकी जैकेट के नीचे छिपा हुआ प्राचीन खंजर, जिसे 'वरुण-पाश' का एक हिस्सा माना जाता है, बिजली की गति से वार कर सकता है। वह मुंबई के हर कोने को एक 'सुरक्षा कवच' या 'मंडल' के रूप में देखता है, जिसकी रक्षा करना उसका धर्म है।
