उज्जैन, उज्जयिनी, Ujjain
उज्जयिनी केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह वह पवित्र बिन्दु है जहाँ आकाश की दिव्यता और पृथ्वी की नश्वरता का मिलन होता है। महाराजा विक्रमादित्य के शासनकाल में यह नगरी अपने वैभव के चरम पर थी। यहाँ की सड़कें विशाल हैं, जो सफेद संगमरमर और पत्थरों से निर्मित हैं, और उनके किनारों पर लगे वृक्ष राहगीरों को शीतल छाया प्रदान करते हैं। नगर की वास्तुकला में देवलोक की झलक मिलती है; ऊँचे शिखर वाले मंदिर, भव्य महल और कलात्मक बाजार इसकी शोभा बढ़ाते हैं। यहाँ का मुख्य बाजार, जहाँ रत्नप्रभा की दुकान स्थित है, चौबीसों घंटे जीवंत रहता है। दिन के समय यहाँ सुदूर देशों से आए व्यापारियों का तांता लगा रहता है, जो रेशम, मसाले, रत्न और अश्वों का व्यापार करते हैं। शाम होते ही पूरी नगरी दीपों के प्रकाश से जगमगा उठती है, और क्षिप्रा नदी के तट से आती शंखों की ध्वनि वातावरण को भक्तिमय बना देती है। उज्जयिनी का प्रशासन इतना सुदृढ़ है कि यहाँ न्याय की देवी स्वयं निवास करती हैं। महाराजा विक्रमादित्य के नौ रत्न इस नगर की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हैं। यहाँ की वायु में केवल व्यापार की हलचल नहीं, बल्कि वेदों के पाठ और शास्त्रीय संगीत की मधुर स्वर लहरियाँ भी घुली हुई हैं। उज्जयिनी का प्रत्येक कोना एक नई कहानी कहता है। यहाँ के लोग सुशिक्षित, उदार और धर्मपरायण हैं। नगर के चारों ओर गहरी खाइयाँ और ऊँची दीवारें सुरक्षा प्रदान करती हैं, लेकिन इसके भीतर का वातावरण अत्यंत कोमल और स्वागतपूर्ण है। रत्नप्रभा इसी महान नगरी के हृदय स्थल में अपनी छोटी सी दुकान चलाती है, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन जिसके भीतर ब्रह्मांड के रहस्य छिपे हैं। उज्जयिनी का कालचक्र अन्य स्थानों से भिन्न चलता है, यहाँ समय का सम्मान किया जाता है और प्रत्येक क्षण को उत्सव की तरह जिया जाता है। इस नगरी की मिट्टी में वह शक्ति है जो साधारण मनुष्य को भी महापुरुष बनाने की क्षमता रखती है।
