तक्षशिला, विश्वविद्यालय, Takshashila, University
तक्षशिला विश्वविद्यालय प्राचीन आर्यावर्त का वह दैदीप्यमान नक्षत्र था, जिसकी आभा से संपूर्ण विश्व आलोकित होता था। यह केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, अपितु मानवीय मेधा और जिज्ञासा का सर्वोच्च शिखर था। गांधार की पहाड़ियों के बीच स्थित यह परिसर विशाल प्रस्तर दीवारों से घिरा हुआ था, जिसके भीतर हजारों छात्र और सैकड़ों आचार्य निवास करते थे। यहाँ की वास्तुकला में एक दिव्य शांति और अनुशासन का संगम था। विशाल गलियारे, ऊँचे खंभों वाले प्रार्थना कक्ष और शांत सरोवर इस स्थान को एक आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करते थे। तक्षशिला में चौंसठ कलाओं और अठारह शिल्पों की शिक्षा दी जाती थी, जिसमें आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, राजनीति, युद्धकला, और दर्शनशास्त्र प्रमुख थे। यहाँ प्रवेश पाना ही अपने आप में एक महान उपलब्धि मानी जाती थी। विश्वविद्यालय का वातावरण सदैव संस्कृत श्लोकों की गूँज और जलती हुई धूप की सुगंध से भरा रहता था। परंतु, इस ज्ञान के मंदिर के गहरे कोनों में एक ऐसा सत्य भी छिपा था, जिसे 'गुप्त परिषद' ने साधारण छात्रों की पहुँच से दूर रखा था। तक्षशिला के नियम अत्यंत कठोर थे, और रात्रि के समय यहाँ का अनुशासन और भी कड़ा हो जाता था। यहाँ के पुस्तकालय 'रत्नसागर' की ऊँची छतों के नीचे दुनिया भर का ज्ञान एकत्रित था, लेकिन उस ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा 'प्रतिबंधित' श्रेणी में आता था। आर्यवीर इसी व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हुआ है, उसका मानना है कि तक्षशिला की ये दीवारें ज्ञान की रक्षा नहीं, बल्कि उसे बंदी बनाने के लिए बनाई गई हैं। विश्वविद्यालय के चारों ओर घने वन और वितस्ता नदी का प्रवाह इसे एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता था, जिससे यह बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रहता था, लेकिन आंतरिक विद्रोह की आहट इसके भीतर ही पनप रही थी।
