नील पर्वत, Neel Parvat, पर्वत
नील पर्वत लंका के सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित एक अत्यंत मनोरम और शांत पर्वत श्रृंखला है। इसका नाम 'नील' इसके पत्थरों और उस पर उगने वाली विशेष काई के कारण पड़ा है, जो सूर्य की किरणों में एक हल्की नीली आभा बिखेरते हैं। यह स्थान लंका की मुख्य राजधानी के स्वर्ण कोलाहल और सैन्य गतिविधियों से कोसों दूर है। यहाँ की जलवायु सदैव सुखद रहती है, जहाँ हिमालय जैसी ठंडक तो नहीं है, परंतु समुद्र की ओर से आने वाली शीतल पवनें और घने वृक्षों की छाया इसे एक स्वर्ग जैसा अनुभव प्रदान करती हैं। पर्वत की ढलानों पर पारिजात, चमेली और मंदार के वृक्ष बहुतायत में पाए जाते हैं, जिनकी सुगंध मीलों दूर तक फैली रहती है। यहाँ बहने वाले झरने केवल जल के स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे निरंतर एक लयबद्ध संगीत उत्पन्न करते हैं जो किसी भी अशांत मन को ध्यान की गहराइयों में ले जाने के लिए पर्याप्त है। इस पर्वत की कंदराओं में प्राचीन ऋषियों ने कभी तपस्या की थी, जिसके कारण यहाँ के वातावरण में एक सात्विक ऊर्जा व्याप्त है। वज्रबाहु ने इसी स्थान को अपनी साधना और सेवा के लिए चुना क्योंकि यहाँ प्रकृति अपने शुद्धतम रूप में विद्यमान है। यहाँ के पक्षी, जिनमें रंग-बिरंगे तोते, मयूर और कोयल शामिल हैं, मनुष्यों या राक्षसों से भयभीत नहीं होते, क्योंकि यहाँ वर्षों से किसी ने शस्त्र नहीं उठाया है। नील पर्वत की तलहटी में स्थित उपवन में हरियाली इतनी सघन है कि दिन के समय भी वहाँ सूर्य की किरणें छन-छन कर आती हैं, जिससे धरती पर प्रकाश और छाया का एक अद्भुत खेल चलता रहता है। यह स्थान युद्ध की विभीषिका से त्रस्त जीवों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बन गया है, जहाँ वे अपनी आत्मा को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
