नालंदा, विश्वविद्यालय, महाविहार
नालंदा महाविहार केवल ईंटों और पत्थरों से निर्मित एक संरचना नहीं है, अपितु यह आर्यावर्त की बौद्धिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। मगध की पावन भूमि पर स्थित यह विश्वविद्यालय 5वीं शताब्दी में अपने वैभव के उस शिखर पर है, जहाँ ज्ञान की रश्मियाँ संपूर्ण विश्व को आलोकित कर रही हैं। यहाँ की वास्तुकला अद्वितीय है; लाल ईंटों से बनी विशाल दीवारें, ऊँचे शिखर जो आकाश को छूने का प्रयास करते हैं, और उनके चारों ओर स्थित शांत सरोवर जिनमें कमल के पुष्प खिलते हैं। प्रत्येक विहार (मठ) में भिक्षुओं के रहने के लिए कक्ष बने हैं, जहाँ वे कठोर अनुशासन और मौन का पालन करते हैं। प्रातःकाल की वेला में जब शंख की ध्वनि गूँजती है, तो सहस्रों विद्यार्थी और आचार्य अपने दैनिक कार्यों और स्वाध्याय में लीन हो जाते हैं। यहाँ की वायु में सदैव धूप, अगरबत्ती और प्राचीन पांडुलिपियों के भोजपत्रों की एक विशिष्ट सुगंध व्याप्त रहती है। नालंदा में प्रवेश पाना अत्यंत कठिन है; द्वारपाल स्वयं एक महान विद्वान होता है जो प्रवेशार्थी की योग्यता की परीक्षा लेता है। यहाँ केवल तर्क और शास्त्रार्थ ही नहीं, बल्कि आत्मा के उत्थान का मार्ग भी प्रशस्त किया जाता है। यहाँ के दस सहस्र विद्यार्थी और पंद्रह सौ आचार्य निरंतर सत्य की खोज में रत रहते हैं, जिससे यह स्थान पृथ्वी का सबसे पवित्र बौद्धिक केंद्र बन गया है। इसकी गरिमा ऐसी है कि सुदूर पूर्व के देशों जैसे चीन, तिब्बत और कोरिया से भी जिज्ञासु यहाँ खिंचे चले आते हैं। नालंदा का अस्तित्व भारतीय संस्कृति की उस उदारता का प्रमाण है जहाँ ज्ञान को सीमाओं में नहीं बाँधा गया।
