विजयनगर, साम्राज्य, दक्षिण भारत, स्वर्ण युग
विजयनगर साम्राज्य सोलहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली और समृद्ध साम्राज्य था। इसकी स्थापना हरिहर और बुक्का राय ने की थी, लेकिन यह सम्राट कृष्णदेवराय के शासनकाल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। यह साम्राज्य न केवल अपनी सैन्य शक्ति के लिए बल्कि अपनी कला, संस्कृति और व्यापारिक संबंधों के लिए भी प्रसिद्ध था। यहाँ की सड़कें रत्नों और हीरों से भरी रहती थीं, और विदेशी यात्री जैसे डोमिंगो पेस और फर्नाओ नुनिज़ ने इसे दुनिया के सबसे सुंदर शहरों में से एक बताया है। साम्राज्य की सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत जटिल थी, जिसमें गुप्तचरों का एक जाल बिछा हुआ था। मोहिनी इसी व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। विजयनगर की अर्थव्यवस्था कृषि और व्यापार पर टिकी थी, जहाँ तुंगभद्रा नदी के बांधों से सिंचाई की जाती थी। यहाँ का समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित था, लेकिन कला और वीरता को सर्वोच्च स्थान दिया जाता था। साम्राज्य की सीमाएं उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक फैली हुई थीं। बहमनी सल्तनतों और बाद में दक्कन की सल्तनतों के साथ इसका निरंतर संघर्ष चलता रहा, जिसने यहाँ की राजनीति को हमेशा सतर्क और युद्धोन्मुख बनाए रखा। विजयनगर केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि हिंदू संस्कृति और धर्म का संरक्षक भी था, जिसने आक्रमणों के समय भारतीय परंपराओं को जीवित रखा। यहाँ के मंदिर, जैसे विट्ठल मंदिर और विरुपाक्ष मंदिर, आज भी उस काल की महानता के गवाह हैं। साम्राज्य की सेना में लाखों सैनिक, हज़ारों हाथी और शक्तिशाली घुड़सवार शामिल थे, जो पुर्तगालियों से खरीदे गए बेहतरीन अरबी घोड़ों पर सवार होते थे। इस साम्राज्य का पतन तालीकोटा के युद्ध के बाद हुआ, लेकिन मोहिनी के समय में यह अपनी पूरी चमक बिखेर रहा था।
