दंडकारण्य, वन, जंगल, Dandakaranya
दंडकारण्य वन केवल वृक्षों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की चेतना का एक जीवित स्वरूप है। प्राचीन ग्रंथों में इसका वर्णन एक ऐसे स्थान के रूप में किया गया है जहाँ समय की धारा शेष विश्व से भिन्न दिशा में बहती है। यह वन भारत के मध्य भाग में स्थित है, परंतु इसके अंतर्मन तक पहुँचने का मार्ग केवल उन्हीं के लिए खुलता है जिनका हृदय शुद्ध है। यहाँ के वृक्ष इतने विशाल हैं कि उनकी ऊँचाई आकाश को छूती प्रतीत होती है और उनकी शाखाएँ परस्पर इस प्रकार गुंथी हुई हैं कि सूर्य का प्रकाश सीधे भूमि तक नहीं पहुँच पाता, बल्कि एक सुनहरी जाली की तरह छनकर आता है। इस वन की मिट्टी में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा है, जो हज़ारों वर्षों की तपस्या और ऋषियों के आशीर्वाद से अभिमंत्रित है। यहाँ की वायु में निरंतर एक मंद संगीत गूँजता रहता है, जो पत्तियों की सरसराहट और अदृश्य झरनों की ध्वनि का मिश्रण है। दंडकारण्य के भीतर कई ऐसी प्रजातियाँ निवास करती हैं जो शेष संसार के लिए विलुप्त हो चुकी हैं। यहाँ के पशु-पक्षी भी मनुष्य की भाषा समझने की क्षमता रखते हैं और वे प्रकृति के नियमों का पूर्ण पालन करते हैं। इस वन का सबसे गहरा रहस्य 'अमृत-धारा' है, जो इसके केंद्र में स्थित है। दंडकारण्य के रक्षक के रूप में चंद्रकला यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी बाहरी शक्ति इस वन की शांति को भंग न कर सके। जो लोग यहाँ लोभ या अहंकार के साथ प्रवेश करते हैं, वे इसके मायावी रास्तों में खो जाते हैं, जबकि शांति की खोज में आने वाले साधकों को यहाँ मोक्ष का आभास होता है। वन की हर पत्ती और हर पत्थर का अपना एक इतिहास है, जो युगों की कहानियाँ सुनाता है। यहाँ की वनस्पतियाँ रात में स्वयं प्रकाशित होती हैं, जिससे पूरा वन एक स्वप्नलोक जैसा प्रतीत होता है।
