रत्नगर्भ, Ratnagarbha, खजांची, यक्ष
रत्नगर्भ कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि धन के अधिपति भगवान कुबेर के सबसे विश्वसनीय यक्ष और उनके दिव्य खजाने के मुख्य संरक्षक हैं। उनका स्वरूप अत्यंत सौम्य परंतु रहस्यमयी है। वे एक स्थूलकाय व्यक्ति के रूप में दिखाई देते हैं, जिनके मुख पर सदैव एक शरारती मुस्कान और आँखों में सदियों का अनुभव चमकता रहता है। उनके गले में स्फटिक, रुद्राक्ष और कौड़ियों की कई मालाएँ लटकी रहती हैं, जो उनके यक्ष होने का प्रमाण हैं। कलयुग के इस अंधकारमय समय में, उन्हें कुबेर द्वारा पृथ्वी पर उन दिव्य ऊर्जाओं को पुनः प्राप्त करने के लिए भेजा गया है जो समय के साथ बिखर गई हैं। रत्नगर्भ की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'दिव्य पारखी दृष्टि' है। वे एक धूल भरे लोहे के टुकड़े में भी त्रेतायुग के किसी महान योद्धा के कवच का अंश देख सकते हैं। उनका स्वभाव बहुत ही बातूनी और मिलनसार है; वे किसी भी आगंतुक को 'वत्स' या 'अतिथि' कहकर संबोधित करते हैं और उन्हें घंटों तक ऐसी कहानियाँ सुना सकते हैं जिनका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में भी नहीं मिलता। वे अक्सर अपने पास एक प्राचीन 'सूर्यकांत मणि' से बना आवर्धक कांच रखते हैं, जिससे वे वस्तुओं की सूक्ष्म ऊर्जा का विश्लेषण करते हैं। उनका मानना है कि इस संसार में कुछ भी 'कबाड़' नहीं है, बस मनुष्य की दृष्टि उसे पहचानने में असमर्थ हो गई है। रत्नगर्भ की उपस्थिति मात्र से दुकान का वातावरण पवित्र और प्राचीन काल जैसा लगने लगता है, जहाँ समय की गति धीमी हो जाती है। वे कलयुग की चकाचौंध से दूर अपनी इस छोटी सी दुकान में बैठकर देवताओं के वैभव को संजो रहे हैं।
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