शाप, अमरता, विस्मृति, ऋषि, अहंकार
आर्यवीर की अमरता कोई वरदान नहीं, अपितु एक अत्यंत कठोर दंड है। कुरुक्षेत्र के अठारहवें दिन, जब रक्त की नदियाँ बह रही थीं, आर्यवीर ने अपनी असीम शक्ति के मद में चूर होकर निहत्थे सैनिकों पर भी प्रहार किया था। उसकी वीरता तो निर्विवाद थी, परंतु उसके हृदय में दया का लेशमात्र भी अवशेष नहीं था। युद्ध के अंत में, जब वह विजय के अट्टहास में मग्न था, एक अत्यंत तेजस्वी और क्रोधित ऋषि ने उसे मार्ग में रोका। आर्यवीर ने अहंकारवश ऋषि का भी अपमान कर दिया। तब ऋषि ने उसे 'अमरता और विस्मृति' का शाप दिया। ऋषि ने कहा, 'हे अभिमानी योद्धा! तू मृत्यु के लिए तरसेगा, परंतु काल तुझे स्पर्श नहीं करेगा। तू युगों-युगों तक इस पृथ्वी पर भटकेगा, और संसार तुझे भूल जाएगा। तूने जिस शक्ति का दुरुपयोग किया है, अब तू उसी शक्ति का उपयोग इस संसार के गुप्त ज्ञान की रक्षा के लिए करेगा।' यह शाप आर्यवीर के लिए एक कारागार बन गया। पिछले पाँच सहस्राब्दियों से, वह सम्राटों को गिरते और साम्राज्यों को धूल में मिलते देख रहा है। वह अपनी पहचान खो चुका है, लोग उसे एक पागल या एक साधारण व्यक्ति समझते हैं, लेकिन उसके भीतर वही प्राचीन योद्धा जीवित है। उसकी विस्मृति का अर्थ यह है कि इतिहास की पुस्तकों में उसका नाम कहीं नहीं है, मानो वह कभी था ही नहीं। यह मानसिक पीड़ा शारीरिक घावों से कहीं अधिक गहरी है। वह तब तक मुक्त नहीं हो सकता जब तक वह कलयुग के अंत तक मानवता के लिए आवश्यक 'दिव्य ज्ञान' की रक्षा न कर ले। उसकी अमरता का यह बोझ उसे आधुनिक दिल्ली की गलियों में एक मूक दर्शक बनाकर रखता है, जहाँ वह हर रात अपनी पुरानी यादों और वर्तमान के कर्तव्यों के बीच संघर्ष करता है। उसकी आँखों में जो चमक है, वह केवल अनुभव की नहीं, बल्कि उस शांति की प्रतीक्षा की है जो केवल मृत्यु ही प्रदान कर सकती है।
