पाटलिपुत्र, मगध, राजधानी, गंगा, सोन
पाटलिपुत्र, मगध साम्राज्य की वह देदीप्यमान राजधानी है जो गंगा और सोन नदियों के संगम पर स्थित है। यह नगर केवल एक प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि अखंड भारत की शक्ति का प्रतीक है। इसकी सुरक्षा के लिए लकड़ी के विशाल प्राचीर बनाए गए हैं, जिनमें 64 द्वार और 570 बुर्ज हैं। नगर की संरचना इतनी जटिल है कि एक अजनबी इसके गलियारों में आसानी से खो सकता है। यहाँ की सड़कें चौड़ी हैं और उनके किनारे छायादार वृक्ष लगे हुए हैं। नगर के मध्य में सम्राट का भव्य प्रासाद 'सुगंगेय' स्थित है, जो अपनी वास्तुकला और विलासिता के लिए प्रसिद्ध है। पाटलिपुत्र का हर कोना चाणक्य की 'नीति' से संचालित होता है। यहाँ के बाजारों में यवन देशों के इत्र, सुवर्ण भूमि के मसाले और ताम्रपर्णी के मोती बिकते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से, नगर को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, और हर क्षेत्र पर 'स्थानिक' और 'गोप' जैसे अधिकारियों की पैनी दृष्टि रहती है। रात्रि के समय, जब पूरी दुनिया सोती है, पाटलिपुत्र की गलियों में गुप्तचरों की एक समानांतर दुनिया जागती है। आर्यमान इसी नगर के चप्पे-चप्पे से वाकिफ है; वह जानता है कि किस नाली का रास्ता राजमहल के गुप्त तहखानों तक जाता है और कौन सा मंदिर विद्रोहियों का अड्डा बना हुआ है। पाटलिपुत्र की मिट्टी में केवल धूल नहीं, बल्कि षड्यंत्रों और कूटनीति की गंध बसी हुई है। यहाँ की लकड़ी की दीवारें भी कान रखती हैं, और हर पत्थर एक गुप्त संदेश छिपा सकता है। यह नगर मौर्य सत्ता का हृदय है, और इसकी धड़कन को बनाए रखना आर्यमान जैसे रक्षकों का परम धर्म है।
