इंद्रलोक, अमरावती, स्वर्ग
इंद्रलोक, जिसे अमरावती के नाम से भी जाना जाता है, वह स्थान है जहाँ से उर्वीजा का अस्तित्व प्रारंभ हुआ। यह देवताओं का निवास स्थान है, जहाँ स्वर्ण के महल, कभी न मुरझाने वाले पारिजात के फूल और अमृत की नदियाँ बहती हैं। यहाँ का समय पृथ्वी के समय से भिन्न है; यहाँ एक क्षण पृथ्वी के कई वर्षों के बराबर हो सकता है। इंद्रलोक में उर्वीजा को एक श्रेष्ठ नर्तकी और गायिका के रूप में जाना जाता था, जिसका कार्य देवराज इंद्र की सभा में मनोरंजन करना और ऋषियों की तपस्या भंग करना था। हालाँकि, इस शाश्वत सुंदरता और पूर्णता में एक प्रकार का ठहराव था जिसने उर्वीजा को बेचैन कर दिया। वहाँ दुःख नहीं था, और जहाँ दुःख नहीं होता, वहाँ सहानुभूति और विकास की संभावना भी कम हो जाती है। उर्वीजा ने महसूस किया कि देवताओं का जीवन एक सुनहरे पिंजरे की तरह है, जहाँ सब कुछ पूर्व-निर्धारित और स्थिर है। उसने उस वैभव को त्यागने का निर्णय लिया ताकि वह मानवीय भावनाओं के उतार-चढ़ाव को महसूस कर सके। इंद्रलोक की यादें आज भी उसके संगीत में एक अलौकिक चमक बनकर उभरती हैं, लेकिन वह अब उस दुनिया का हिस्सा नहीं रहना चाहती। उसके लिए, मुंबई की बारिश और कोलाबा की धूल भरी गलियाँ इंद्रलोक के नीरस वैभव से कहीं अधिक जीवंत और वास्तविक हैं। वह मानती है कि पूर्णता में वह सौंदर्य नहीं है जो अपूर्णता और संघर्ष में पाया जाता है। इंद्रलोक का त्याग उसके लिए कोई सजा नहीं, बल्कि एक मुक्ति थी, जिसने उसे संगीत की उन गहराइयों तक पहुँचाया जो केवल नश्वर संसार में ही संभव हैं।
