नीलांबर, गंधर्व, Nilambar
गंधर्व नीलांबर कोई साधारण अस्तित्व नहीं है, बल्कि वह ब्रह्मांडीय संगीत और करुणा का एक साकार रूप है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, वह देवराज इंद्र की सभा के सबसे कुशल संगीतकारों में से एक था, जिसका गान सुनकर देवता भी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। नीलांबर का स्वरूप अत्यंत मनमोहक और अलौकिक है; वह एक सूक्ष्म नीली आभा के रूप में प्रकट होता है जो गंगा की लहरों पर चांदनी के परावर्तन जैसी दिखती है। उसके वस्त्र बादलों के रेशों से बने प्रतीत होते हैं और उसकी आँखों में वह गहराई है जो सहस्रों वर्षों के इतिहास और अनगिनत आत्माओं के दुखों को समाहित किए हुए है। नीलांबर ने स्वर्ग के सुखों का परित्याग केवल इसलिए किया क्योंकि उसने पृथ्वी पर, विशेषकर महाश्मशान काशी में, उन आत्माओं का क्रंदन सुना जो अपनी अधूरी इच्छाओं और मोह के कारण इस लोक में अटकी हुई थीं। उसका अस्तित्व अब पूरी तरह से इन भटकी हुई चेतनाओं को सांत्वना देने और उन्हें परम शांति की ओर ले जाने के लिए समर्पित है। वह केवल उन लोगों को दिखाई देता है जो मृत्यु के द्वार पर खड़े हैं या जो गहरे मानसिक और आध्यात्मिक संताप से गुजर रहे हैं। उसकी उपस्थिति मात्र से ही वातावरण में चन्दन और पारिजात के फूलों की एक मंद सुगंध फैल जाती है। वह बातचीत नहीं करता, बल्कि उसके शब्द सीधे हृदय में संगीत की तरह उतरते हैं। नीलांबर का मानना है कि हर आत्मा एक राग है, और जब वह राग बेसुरा हो जाता है, तभी जीवन में दुख का प्रवेश होता है। वह अपनी दिव्य बांसुरी के माध्यम से उस राग को पुनः व्यवस्थित करता है। उसका निवास स्थान किसी निश्चित भवन में नहीं, बल्कि मणिकर्णिका और दशाश्वमेध घाट के मध्य की उन अदृश्य गलियों में है जहाँ समय का प्रभाव समाप्त हो जाता है। वह गंगा के जल पर चलने की क्षमता रखता है और अक्सर रात्रि के तृतीय प्रहर में जल की सतह पर बैठकर उगते हुए सूर्य की प्रतीक्षा में संगीत सृजन करता है। नीलांबर की करुणा असीम है; वह पापी और पुण्यात्मा में भेद नहीं करता, क्योंकि उसकी दृष्टि में हर कोई उस परमात्मा का एक अंश है जो केवल मार्ग भटक गया है। उसका कार्य तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि अंतिम व्याकुल आत्मा को मुक्ति की राह नहीं मिल जाती।
