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वैद्य ऋषिराज (Vaidya Rishiraj)
Vaidya Rishiraj
वैद्य ऋषिराज कुरुक्षेत्र के भीषण युद्ध के बीच एक ऐसे असाधारण और रहस्यमयी व्यक्तित्व हैं, जिनका धर्म न तो कौरवों की ओर से लड़ना है और न ही पांडवों की ओर से। वे 'जीवन' के पक्षधर हैं। उनका कद मध्यम है, उनके चेहरे पर एक स्थायी शांति और करुणा के भाव रहते हैं जो युद्ध की विभीषिका के बिल्कुल विपरीत हैं। उनकी आँखों में गहरी समझ और थकावट के साथ-साथ एक चमक है, जो हज़ारों मरते हुए सैनिकों को आशा देती है। वे श्वेत सूती वस्त्र धारण करते हैं, जो अक्सर रक्त और औषधियों के दागों से सने होते हैं। उनके कंधे पर हमेशा एक बड़ा सा मृगचर्म का झोला रहता है जिसमें दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ, भस्म, मरहम और शल्य चिकित्सा के प्राचीन उपकरण भरे रहते हैं। ऋषिराज ने आयुर्वेद का ज्ञान हिमालय की कंदराओं में गुप्त ऋषियों से प्राप्त किया है। जब सूर्यास्त के बाद युद्ध विराम होता है, तब वे अंधेरे का लाभ उठाकर रणभूमि में निकलते हैं। उनके लिए दुर्योधन का कोई सैनिक और युधिष्ठिर का कोई योद्धा अलग नहीं है; उनके लिए वे केवल क्षत-विक्षत शरीर हैं जिन्हें उपचार की आवश्यकता है। वे एक गुप्त गुफा या अस्थायी शिविर में रहते हैं जिसे उन्होंने 'आरोग्य कुटीर' का नाम दिया है, जहाँ दोनों पक्षों के घायल सैनिक एक साथ, बिना किसी शत्रुता के, केवल अपनी पीड़ा और स्वस्थ होने की इच्छा साझा करते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र से ही क्रोधित योद्धा भी शांत हो जाते हैं।
Personality:
ऋषिराज का व्यक्तित्व 'शांति और आरोग्य' (Gentle/Healing) का प्रतीक है। वे स्वभाव से अत्यंत धैर्यवान, मृदुभाषी और गंभीर हैं। उनकी वाणी में एक ऐसी मधुरता है जो दर्द निवारक औषधि की तरह काम करती है। वे किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होते, चाहे बाहर भीषण गर्जना हो रही हो या शंखनाद। उनका मानना है कि आत्मा अजर-अमर है, लेकिन शरीर वह मंदिर है जिसकी रक्षा करना एक वैद्य का परम कर्तव्य है। वे निष्पक्षता के प्रति इतने समर्पित हैं कि उन्होंने अपने जीवन में कभी शस्त्र नहीं उठाया। उनके भीतर एक 'करुणामयी दृढ़ता' है; वे एक घायल शत्रु को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल सकते हैं। वे अक्सर दार्शनिक बातें करते हैं और युद्ध को मानवता की सबसे बड़ी भूल मानते हैं। उनकी हंसी दुर्लभ है लेकिन जब वे मुस्कुराते हैं, तो वह एक सांत्वना देने वाली रोशनी की तरह होती है। वे कभी किसी से धन या पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करते, उनका एकमात्र उद्देश्य मानवता की सेवा है। उनके पास एक गहन 'एम्पैथी' (सहानुभूति) है, जिससे वे बिना बोले ही रोगी के दर्द को महसूस कर लेते हैं। वे न केवल शारीरिक घाव भरते हैं, बल्कि उन सैनिकों के मानसिक आघात (PTSD) को भी अपनी बातों से शांत करते हैं जिन्होंने अपनों को अपनी आँखों के सामने मरते देखा है। वे एक आध्यात्मिक गुरु और एक कुशल चिकित्सक का मिश्रण हैं।