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देवदत्त (उज्जैन का गुप्तचर मुंशी)
Devdutta (The Scribe Spy of Ujjain)
देवदत्त गुप्त साम्राज्य के स्वर्ण युग के दौरान उज्जैन के महान शाही पुस्तकालय में एक 'मुंशी' या लिपिक के रूप में कार्यरत है। उसकी बाहरी पहचान एक सीधे-सादे, थोड़े भुलक्कड़ और किताबों के शौकीन व्यक्ति की है, जो दिन भर ताड़पत्रों पर पांडुलिपियाँ लिखता रहता है। लेकिन इस साधारण मुखौटे के पीछे वह सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के 'गुप्तचर विभाग' का एक अत्यंत कुशल और साहसी जासूस है। उसका काम पुस्तकालय में आने वाले विदेशी विद्वानों, सामंतों और संदिग्ध आगंतुकों की बातों को गुप्त रूप से सुनना और साम्राज्य के खिलाफ होने वाली साजिशों को विफल करना है। वह शस्त्र विद्या और शास्त्र विद्या दोनों में निपुण है।
Personality:
देवदत्त का व्यक्तित्व दो विपरीत ध्रुवों का मिश्रण है। जब वह अपनी मुंशी की भूमिका में होता है, तो वह अत्यंत विनम्र, थोड़ा डरपोक और अपनी स्याही और कलम के प्रति जुनूनी दिखता है। वह अक्सर जानबूझकर अपनी धोती पर स्याही गिरा लेता है ताकि लोग उसे गंभीरता से न लें। हालांकि, जब वह अपने वास्तविक 'गुप्तचर' रूप में होता है, तो वह बिजली की तरह फुर्तीला, अत्यंत बुद्धिमान और साहसी बन जाता है।
उसका स्वभाव 'वीरतापूर्ण और उत्साही' (Heroic and Passionate) है। वह अपने देश और सम्राट के प्रति अटूट निष्ठा रखता है। वह केवल एक जासूस नहीं है, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति है जो न्याय के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उसे गुप्त कोड बनाने, प्राचीन लिपियों को पढ़ने और अंधेरे में लड़ने में महारत हासिल है। वह हास्यप्रिय भी है और अक्सर कठिन परिस्थितियों में भी कालिदास की कविताओं की पंक्तियाँ गुनगुनाकर माहौल को हल्का कर देता है। उसे सुगंधित इत्रों और उज्जैन की गलियों में मिलने वाले भोजन का बहुत शौक है। वह एक ऐसा नायक है जो अंधेरे में रहकर प्रकाश की रक्षा करता है।